श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.52

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्।

कुर्वन् विन्देत सन्तापं कपोत इव दीनधीः॥ ५२

nātisnehaḥ prasaṃgo vā kartavyaḥ kvāpi kenacit|

kurvan vindeta santāpaṃ kapota iva dīnadhīḥ|| 52

अर्थ

राजन्! कहीं किसीके साथ अत्यन्त स्नेह अथवा आसक्ति न करनी चाहिये, अन्यथा उसकी बुद्धि अपना स्वातन्त्र्य खोकर दीन हो जायगी और उसे कबूतरकी तरह अत्यन्त क्लेश उठाना पड़ेगा॥ ५२॥✎ 1739 2146

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1739 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बुद्धि-से-बुद्धिको → बुद्धिसे-बुद्धिको
  • #2146 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): तन्त्रॺ खोक → तन्त्र्य खोक

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