श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.51

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

बुध्यते स्वे न भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।

लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत्॥ ५१

budhyate sve na bhedena vyaktistha iva tadgataḥ|

lakṣyate sthūlamatibhirātmā cāvasthito'rkavat|| 51

अर्थ

स्थूलबुद्धि पुरुषोंको जलके विभिन्‍न पात्रोंमें प्रतिबिम्बित हुआ सूर्य उन्हींमें प्रविष्ट-सा होकर भिन्‍न-भिन्‍न दिखायी पड़ता है। परन्तु इससे स्वरूपतः सूर्य अनेक नहीं हो जाता; वैसे ही चल-अचल उपाधियोंके भेदसे ऐसा जान पड़ता है कि प्रत्येक व्यक्तिमें आत्मा अलग-अलग है। परन्तु जिनको ऐसा मालूम होता है, उनकी बुद्धि मोटी है। असल बात तो यह है कि आत्मा सूर्यके समान एक ही है। स्वरूपतः उसमें कोई भेद नहीं है॥ ५१॥

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