श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

क्वचिच्छन्‍नः क्‍वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम्।

भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम्॥ ४६✎ 1216

kvacicchannaḥ kvacit spaṣṭa upāsyaḥ śreya icchatām|

bhuṅkte sarvatra dātṝṇāṃ dahan prāguttarāśubham|| 46

अर्थ

जैसे अग्‍नि कहीं (लकड़ी आदिमें) अप्रकट रहती है और कहीं प्रकट, वैसे ही साधक भी कहीं गुप्त रहे और कहीं प्रकट हो जाय। वह कहीं-कहीं ऐसे रूपमें भी प्रकट हो जाता है, जिससे कल्याणकामी पुरुष उसकी उपासना कर सकें। वह अग्‍निके समान ही भिक्षारूप हवन करनेवालोंके अतीत और भावी अशुभको भस्म कर देता है तथा सर्वत्र अन्‍न ग्रहण करता है॥ ४६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1216 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दातृणां → दातॄणां

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