श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

त्वं हि नः पृच्छतां ब्रह्मन्‍नात्मन्यानन्दकारणम्।

ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः॥ ३०

tvaṃ hi naḥ pṛcchatāṃ brahmannātmanyānandakāraṇam|

brūhi sparśavihīnasya bhavataḥ kevalātmanaḥ|| 30

अर्थ

ब्रह्मन्! आप पुत्र, स्त्री, धन आदि संसारके स्पर्शसे भी रहित हैं। आप सदा-सर्वदा अपने केवल स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। हम आपसे यह पूछना चाहते हैं कि आपको अपने आत्मामें ही ऐसे अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव कैसे होता है? आप कृपा करके अवश्य बतलाइये॥ ३०॥

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