श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्‍निना।

न तप्यसेऽग्‍निना मुक्तो गंगाम्भःस्थ इव द्विपः॥ २९

janeṣu dahyamāneṣu kāmalobhadavāgninā|

na tapyase'gninā mukto gaṃgāmbhaḥstha iva dvipaḥ|| 29

अर्थ

संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानलसे जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें दावाग्‍नि लगनेपर उससे छूटकर गंगाजलमें खड़ा हो॥ २९॥

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