na tapyase'gninā mukto gaṃgāmbhaḥstha iva dvipaḥ|| 29
अर्थ
संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानलसे जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें दावाग्नि लगनेपर उससे छूटकर गंगाजलमें खड़ा हो॥ २९॥
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना।
न तप्यसेऽग्निना मुक्तो गंगाम्भःस्थ इव द्विपः॥ २९
संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानलसे जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें दावाग्नि लगनेपर उससे छूटकर गंगाजलमें खड़ा हो॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 755) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/29/