श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तव विक्रीडितं कृष्ण नृणां परममंगलम्।✎ 1215

कर्णपीयूषमास्वाद्य त्यजत्यन्यस्पृहां जनः॥ ४४

tava vikrīḍitaṃ kṛṣṇa nṛṇāṃ paramamaṃgalam|

karṇapīyūṣamāsvādya tyajatyanyaspṛhāṃ janaḥ|| 44

अर्थ

प्यारे कृष्ण! आपकी एक-एक लीला मनुष्योंके लिये परम मंगलमयी और कानोंके लिये अमृतस्वरूप है। जिसे एक बार उस रसका चसका लग जाता है, उसके मनमें फिर किसी दूसरी वस्तुके लिये लालसा ही नहीं रह जाती। प्रभो! हम तो उठते-बैठते, सोते-जागते, घूमते-फिरते आपके साथ रहे हैं, हमने आपके साथ स्नान किया, खेल खेले, भोजन किया; कहाँतक गिनावें, हमारी एक-एक चेष्टा आपके साथ होती रही। आप हमारे प्रियतम हैं; और तो क्या, आप हमारे आत्मा ही हैं। ऐसी स्थितिमें हम आपके प्रेमी भक्त आपको कैसे छोड़ सकते हैं?॥ ४४-४५॥

यह अर्थ श्लोक 44–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1215 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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