श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

विभ्व्यस्तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः

पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम्।

आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्‌घ्रिजमंगसङ्गै-

स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति॥ १९

vibhvyastavāmṛtakathodavahāstrilokyāḥ

pādāvanejasaritaḥ śamalāni hantum|

ānuśravaṃ śrutibhiraṅghrijamaṃgasaṅgai-

stīrthadvayaṃ śuciṣadasta upaspṛśanti|| 19

अर्थ

आपने त्रिलोकीकी पाप-राशिको धो बहानेके लिये दो प्रकारकी पवित्र नदियाँ बहा रखी हैं—एक तो आपकी अमृतमयी लीलासे भरी कथानदी और दूसरी आपके पाद-प्रक्षालनके जलसे भरी गंगाजी। अतः सत्संगसेवी विवेकीजन कानोंके द्वारा आपकी कथा-नदीमें और शरीरके द्वारा गंगाजीमें गोता लगाकर दोनों ही तीर्थोंका सेवन करते हैं और अपने पाप-ताप मिटा देते हैं॥ १९॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

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