रजोगुणकी अधिकताके कारण उनके संकल्प बड़े घोर होते हैं। कामनाओंकी तो सीमा ही नहीं रहती, उनका क्रोध भी ऐसा होता है जैसे साँपका, बनावट और घमंडसे उन्हें प्रेम होता है। वे पापीलोग भगवान्के प्यारे भक्तोंकी हँसी उड़ाया करते हैं॥ ७॥✎ 173017311911
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अहिमन्यवः।
दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतप्रियान्॥ ७
रजोगुणकी अधिकताके कारण उनके संकल्प बड़े घोर होते हैं। कामनाओंकी तो सीमा ही नहीं रहती, उनका क्रोध भी ऐसा होता है जैसे साँपका, बनावट और घमंडसे उन्हें प्रेम होता है। वे पापीलोग भगवान्के प्यारे भक्तोंकी हँसी उड़ाया करते हैं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 737) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/5/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)