श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कर्मण्यकोविदाः स्तब्धा मूर्खाः पण्डितमानिनः।

वदन्ति चाटुकान् मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुकाः॥ ६

karmaṇyakovidāḥ stabdhā mūrkhāḥ paṇḍitamāninaḥ|

vadanti cāṭukān mūḍhā yayā mādhvyā girotsukāḥ|| 6

अर्थ

उन्हें कर्मका रहस्य मालूम नहीं है। मूर्ख होनेपर भी वे अपनेको पण्डित मानते हैं और अभिमानमें अकड़े रहते हैं। वे मीठी-मीठी बातोंमें भूल जाते हैं और केवल वस्तु-शून्य शब्द-माधुरीके मोहमें पड़कर चटकीली-भड़कीली बातें कहा करते हैं॥ ६॥✎ 1730 1731 1911

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1730 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-तत्त्वका → परमतत्त्वका
  • #1731 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वेदा-ध्ययनसे → वेदाध्ययनसे
  • #1911 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रवृति → प्रवृत्ति

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें