वे पृथ्वीके भारभूत राजवेषधारी असुरोंका नाश और संतोंकी रक्षा करनेके लिये तथा जीवोंको परम शान्ति और मुक्ति देनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं और इसीके लिये जगत्में उनकी कीर्ति भी गायी जाती है॥ ५०॥
भूभारासुरराजन्यहन्तवे गुप्तये सताम्।
अवतीर्णस्य निर्वृत्यै यशो लोके वितन्यते॥ ५०
वे पृथ्वीके भारभूत राजवेषधारी असुरोंका नाश और संतोंकी रक्षा करनेके लिये तथा जीवोंको परम शान्ति और मुक्ति देनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं और इसीके लिये जगत्में उनकी कीर्ति भी गायी जाती है॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 744) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/5/50/