श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

मापत्यबुद्धिमकृथाः कृष्णे सर्वात्मनीश्‍वरे।

मायामनुष्यभावेन गूढैश्‍वर्ये परेऽव्यये॥ ४९

māpatyabuddhimakṛthāḥ kṛṣṇe sarvātmanīśvare|

māyāmanuṣyabhāvena gūḍhaiśvarye pare'vyaye|| 49

अर्थ

वसुदेवजी! तुम श्रीकृष्णको केवल अपना पुत्र ही मत समझो। वे सर्वात्मा, सर्वेश्‍वर, कारणातीत और अविनाशी हैं। उन्होंने लीलाके लिये मनुष्यरूप प्रकट करके अपना ऐश्‍वर्य छिपा रखा है॥ ४९॥ वे पृथ्वीके भारभूत राजवेषधारी असुरोंका नाश और संतोंकी रक्षा करनेके लिये तथा जीवोंको परम शान्ति और मुक्ति देनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं और इसीके लिये जगत‍्में उनकी कीर्ति भी गायी जाती है॥ ५०॥

यह व्याख्या श्लोक 11.5.49 से 11.5.50 तककी एक साथ है।

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