श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

दर्शनालिंगनालापैः शयनासनभोजनैः।

आत्मा वां पावितः कृष्णे पुत्रस्नेहं प्रकुर्वतोः॥ ४७

darśanāliṃganālāpaiḥ śayanāsanabhojanaiḥ|

ātmā vāṃ pāvitaḥ kṛṣṇe putrasnehaṃ prakurvatoḥ|| 47

अर्थ

तुमलोगोंने भगवान्‌के दर्शन, आलिंगन तथा बातचीत करने एवं उन्हें सुलाने, बैठाने, खिलाने आदिके द्वारा वात्सल्य-स्नेह करके अपना हृदय शुद्ध कर लिया है; तुम परम पवित्र हो गये हो॥ ४७॥

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