श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवताञ्छ्रुतान्।

आस्थितः श्रद्धया युक्तो निःसंगो यास्यसे परम्॥ ४५

tvamapyetān mahābhāga dharmān bhāgavatāñchrutān|

āsthitaḥ śraddhayā yukto niḥsaṃgo yāsyase param|| 45

अर्थ

महाभाग्यवान् वसुदेवजी! मैंने तुम्हारे आगे जिन भागवतधर्मोंका वर्णन किया है, तुम भी यदि श्रद्धाके साथ इनका आचरण करोगे तो अन्तमें सब आसक्तियोंसे छूटकर भगवान्‌का परमपद प्राप्त कर लोगे॥ ४५॥

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