श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च।

प्रद्युम्‍नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः॥ २९

namaste vāsudevāya namaḥ saṃkarṣaṇāya ca|

pradyumnāyāniruddhāya tubhyaṃ bhagavate namaḥ|| 29

अर्थ

वे लोग इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति करते हैं—‘हे ज्ञानस्वरूप भगवान् वासुदेव एवं क्रियाशक्तिरूप संकर्षण! हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं। भगवान् प्रद्युम्‍न और अनिरुद्धके रूपमें हम आपको नमस्कार करते हैं। ऋषि नारायण, महात्मा नर, विश्‍वेश्‍वर, विश्‍वरूप और सर्वभूतात्मा भगवान्‌को हम नमस्कार करते हैं॥ २९-३०॥

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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