श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यद् घ्राणभक्षो विहितः सुराया-

स्तथा पशोरालभनं न हिंसा।

एवं व्यवायः प्रजया न रत्या

इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम्॥ १३

yad ghrāṇabhakṣo vihitaḥ surāyā-

stathā paśorālabhanaṃ na hiṃsā|

evaṃ vyavāyaḥ prajayā na ratyā

imaṃ viśuddhaṃ na viduḥ svadharmam|| 13

अर्थ

सौत्रामणि यज्ञमें भी सुराको सूँघनेका ही विधान है, पीनेका नहीं। यज्ञमें पशुका आलभन (स्पर्शमात्र) ही विहित है, हिंसा नहीं। इसी प्रकार अपनी धर्मपत्‍नीके साथ मैथुनकी आज्ञा भी विषयभोगके लिये नहीं, धार्मिक परम्पराकी रक्षाके निमित्त सन्तान उत्पन्‍न करनेके लिये ही दी गयी है। परन्तु जो लोग अर्थवादके वचनोंमें फँसे हैं, विषयी हैं, वे अपने इस विशुद्ध धर्मको जानते ही नहीं॥ १३॥✎ 1730 1731 1911

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1730 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-तत्त्वका → परमतत्त्वका
  • #1731 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वेदा-ध्ययनसे → वेदाध्ययनसे
  • #1911 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रवृति → प्रवृत्ति

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