श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

धनं च धर्मैकफलं यतो वै

ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्ति।

गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य

मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम्॥ १२

dhanaṃ ca dharmaikaphalaṃ yato vai

jñānaṃ savijñānamanupraśānti|

gṛheṣu yuñjanti kalevarasya

mṛtyuṃ na paśyanti durantavīryam|| 12

अर्थ

धनका एकमात्र फल है धर्म; क्योंकि धर्मसे ही परमतत्त्वका ज्ञान और उसकी निष्ठा—अपरोक्ष अनुभूति सिद्ध होती है और निष्ठामें ही परम शान्ति है। परन्तु यह कितने खेदकी बात है कि लोग उस धनका उपयोग घर-गृहस्थीके स्वार्थोंमें या कामभोगमें ही करते हैं और यह नहीं देखते कि हमारा यह शरीर मृत्युका शिकार है और वह मृत्यु किसी प्रकार भी टाली नहीं जा सकती॥ १२॥✎ 1730 1731 1911

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1730 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-तत्त्वका → परमतत्त्वका
  • #1731 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वेदा-ध्ययनसे → वेदाध्ययनसे
  • #1911 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रवृति → प्रवृत्ति

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