श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा

जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।

वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान्

शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते॥ २२

bhūmerbharāvataraṇāya yaduṣvajanmā

jātaḥ kariṣyati surairapi duṣkarāṇi|

vādairvimohayati yajñakṛto'tadarhān

śūdrān kalau kṣitibhujo nyahaniṣyadante|| 22

अर्थ

राजन्! अजन्मा होनेपर भी पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वे ही भगवान् यदुवंशमें जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते। फिर आगे चलकर भगवान् ही बुद्धके रूपमें प्रकट होंगे और यज्ञके अनधिकारियोंको यज्ञ करते देखकर अनेक प्रकारके तर्क-वितर्कोंसे मोहित कर लेंगे और कलियुगके अन्तमें कल्कि-अवतार लेकर वे ही शूद्र राजाओंका वध करेंगे॥ २२॥✎ 1729

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1729 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हैहय-वंशका → हैहयवंशका

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