श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

मुसलावशेषायःखण्डकृतेषुर्लुब्धको जरा।

मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशंकया॥ ३३

musalāvaśeṣāyaḥkhaṇḍakṛteṣurlubdhako jarā|

mṛgāsyākāraṃ taccaraṇaṃ vivyādha mṛgaśaṃkayā|| 33

अर्थ

परीक्षित्! जरा नामका एक बहेलिया था। उसने मूसलके बचे हुए टुकड़ेसे अपने बाणकी गाँसी बना ली थी। उसे दूरसे भगवान्‌का लाल-लाल तलवा हरिनके मुखके समान जान पड़ा। उसने उसे सचमुच हरिन समझकर अपने उसी बाणसे बींध दिया॥ ३३॥

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