श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

अन्ये च ये वै निशठोल्मुकादयः

सहस्रजिच्छतजिद्भानुमुख्याः ।

अन्योन्यमासाद्य मदान्धकारिता

जघ्नुर्मुकुन्देन विमोहिता भृशम्॥ १७

anye ca ye vai niśaṭholmukādayaḥ

sahasrajicchatajidbhānumukhyāḥ |

anyonyamāsādya madāndhakāritā

jaghnurmukundena vimohitā bhṛśam|| 17

अर्थ

इनके अतिरिक्त निशठ, उल्मुक, सहस्रजित्, शतजित् और भानु आदि यादव भी एक-दूसरेसे गुँथ गये। भगवान् श्रीकृष्णकी मायाने तो इन्हें अत्यन्त मोहित कर ही रखा था, इधर मदिराके नशेने भी इन्हें अंधा बना दिया था॥ १७॥

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