श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यर्ह्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या

चेतोमलानि विधमेद् गुणकर्मजानि।

तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं

साक्षाद् यथामलदृशोः सवितृप्रकाशः॥ ४०

yarhyabjanābhacaraṇaiṣaṇayorubhaktyā

cetomalāni vidhamed guṇakarmajāni|

tasmin viśuddha upalabhyata ātmatattvaṃ

sākṣād yathāmaladṛśoḥ savitṛprakāśaḥ|| 40

अर्थ

जब भगवान् कमलनाभके चरण-कमलोंको प्राप्त करनेकी इच्छासे तीव्र भक्ति की जाती है तब वह भक्ति ही अग्‍निकी भाँति गुण और कर्मोंसे उत्पन्‍न हुए चित्तके सारे मलोंको जला डालती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है—जैसे नेत्रोंके निर्विकार हो जानेपर सूर्यके प्रकाशकी प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है॥ ४०॥

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