श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.39

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्‍चितेषु

प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र।

सन्‍ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते

कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः॥ ३९

aṇḍeṣu peśiṣu taruṣvaviniściteṣu

prāṇo hi jīvamupadhāvati tatra tatra|

sanne yadindriyagaṇe'hami ca prasupte

kūṭastha āśayamṛte tadanusmṛtirnaḥ|| 39

अर्थ

जगत‍्में चार प्रकारके जीव होते हैं—अंडा फोड़कर पैदा होनेवाले पक्षी-साँप आदि, नालमें बँधे पैदा होनेवाले पशु-मनुष्य, धरती फोड़कर निकलनेवाले वृक्ष-वनस्पति और पसीनेसे उत्पन्‍न होनेवाले खटमल आदि। इन सभी जीव-शरीरोंमें प्राणशक्ति जीवके पीछे लगी रहती है। शरीरोंके भिन्‍न-भिन्‍न होनेपर भी प्राण एक ही रहता है। सुषुप्ति-अवस्थामें जब इन्द्रियाँ निश्‍चेष्ट हो जाती हैं, अहंकार भी सो जाता है—लीन हो जाता है, अर्थात् लिंगशरीर नहीं रहता, उस समय यदि कूटस्थ आत्मा भी न हो तो इस बातकी पीछेसे स्मृति ही कैसे हो कि मैं सुखसे सोया था। पीछे होनेवाली यह स्मृति ही उस समय आत्माके अस्तित्वको प्रमाणित करती है॥ ३९॥

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