॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.29.43
तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशीलः संयतेन्द्रियः।
शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुतः॥ ४३
titikṣurdvandvamātrāṇāṃ suśīlaḥ saṃyatendriyaḥ|
śāntaḥ samāhitadhiyā jñānavijñānasaṃyutaḥ|| 43
अर्थ
सर्दी-गरमी, सुख-दुःख—जो कुछ आ पड़े, उसे सम रहकर सहना। स्वभाव सौम्य रखना, इन्द्रियोंको वशमें रखना। चित्त शान्त रहे। बुद्धि समाहित रहे और तुम स्वयं मेरे स्वरूपके ज्ञान और अनुभवमें डूबे रहना॥ ४३॥✎ 1771