॥ श्रीहरिः ॥
ईक्षयालकनन्दाया विधूताशेषकल्मषः।
वसानो वल्कलान्यंग वन्यभुक् सुखनिःस्पृहः॥ ४२
īkṣayālakanandāyā vidhūtāśeṣakalmaṣaḥ|
vasāno valkalānyaṃga vanyabhuk sukhaniḥspṛhaḥ|| 42
अर्थ
अलकनन्दाके दर्शनमात्रसे तुम्हारे सारे पाप-ताप नष्ट हो जायँगे। प्रिय उद्धव! तुम वहाँ वृक्षोंकी छाल पहनना, वनके कन्द-मूल-फल खाना और किसी भोगकी अपेक्षा न रखकर निःस्पृह-वृत्तिसे अपने-आपमें मस्त रहना॥ ४२॥✎ 1771
ईक्षयालकनन्दाया विधूताशेषकल्मषः।
वसानो वल्कलान्यंग वन्यभुक् सुखनिःस्पृहः॥ ४२
अलकनन्दाके दर्शनमात्रसे तुम्हारे सारे पाप-ताप नष्ट हो जायँगे। प्रिय उद्धव! तुम वहाँ वृक्षोंकी छाल पहनना, वनके कन्द-मूल-फल खाना और किसी भोगकी अपेक्षा न रखकर निःस्पृह-वृत्तिसे अपने-आपमें मस्त रहना॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 896) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/29/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1771 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गंगा-जलका → गंगाजलका