महायोगेश्वर! मेरा आपको नमस्कार है। अब आप कृपा करके मुझ शरणागतको ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे आपके चरणकमलोंमें मेरी अनन्य भक्ति बनी रहे॥ ४०॥✎ 906
नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि माम्।
यथा त्वच्चरणाम्भोजे रतिः स्यादनपायिनी॥ ४०
महायोगेश्वर! मेरा आपको नमस्कार है। अब आप कृपा करके मुझ शरणागतको ऐसी आज्ञा दीजिये, जिससे आपके चरणकमलोंमें मेरी अनन्य भक्ति बनी रहे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 895) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/29/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)