आपने अपनी मायासे सृष्टिवृद्धिके लिये दाशार्ह, वृष्णि, अन्धक और सात्वतवंशी यादवोंके साथ मुझे सुदृढ़ स्नेह-पाशसे बाँध दिया था। आज आपने आत्मबोधकी तीखी तलवारसे उस बन्धनको अनायास ही काट डाला॥ ३९॥✎ 906
वृक्णश्च मे सुदृढः स्नेहपाशो
दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु ।
प्रसारितः सृष्टिविवृद्धये त्वया
स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना॥ ३९
आपने अपनी मायासे सृष्टिवृद्धिके लिये दाशार्ह, वृष्णि, अन्धक और सात्वतवंशी यादवोंके साथ मुझे सुदृढ़ स्नेह-पाशसे बाँध दिया था। आज आपने आत्मबोधकी तीखी तलवारसे उस बन्धनको अनायास ही काट डाला॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 895) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/29/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)