श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

स एवमादर्शितयोगमार्ग-

स्तदोत्तमश्‍लोकवचो निशम्य।

बद्धांजलिः प्रीत्युपरुद्धकण्ठो

न किंचिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्षः॥ ३५

sa evamādarśitayogamārga-

stadottamaślokavaco niśamya|

baddhāṃjaliḥ prītyuparuddhakaṇṭho

na kiṃcidūce'śrupariplutākṣaḥ|| 35

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब उद्धवजी योगमार्गका पूरा-पूरा उपदेश प्राप्त कर चुके थे। भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर उनकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। प्रेमकी बाढ़से गला रुँध गया, चुपचाप हाथ जोड़े रह गये और वाणीसे कुछ बोला न गया॥ ३५॥

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