श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब उद्धवजी योगमार्गका पूरा-पूरा उपदेश प्राप्त कर चुके थे। भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर उनकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। प्रेमकी बाढ़से गला रुँध गया, चुपचाप हाथ जोड़े रह गये और वाणीसे कुछ बोला न गया॥ ३५॥
स एवमादर्शितयोगमार्ग-
स्तदोत्तमश्लोकवचो निशम्य।
बद्धांजलिः प्रीत्युपरुद्धकण्ठो
न किंचिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्षः॥ ३५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब उद्धवजी योगमार्गका पूरा-पूरा उपदेश प्राप्त कर चुके थे। भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर उनकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। प्रेमकी बाढ़से गला रुँध गया, चुपचाप हाथ जोड़े रह गये और वाणीसे कुछ बोला न गया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 895) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/29/35/