श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा

निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।

तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो

मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै॥ ३४

martyo yadā tyaktasamastakarmā

niveditātmā vicikīrṣito me|

tadāmṛtatvaṃ pratipadyamāno

mayā''tmabhūyāya ca kalpate vai|| 34

अर्थ

जिस समय मनुष्य समस्त कर्मोंका परित्याग करके मुझे आत्मसमर्पण कर देता है, उस समय वह मेरा विशेष माननीय हो जाता है और मैं उसे उसके जीवत्वसे छुड़ाकर अमृतस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति करा देता हूँ और वह मुझसे मिलकर मेरा स्वरूप हो जाता है॥ ३४॥

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