श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अथात आनन्ददुघं पदाम्बुजं

हंसाः श्रयेरन्‍नरविन्दलोचन।

सुखं नु विश्‍वेश्‍वर योगकर्मभि-

स्त्वन्माययामी विहता न मानिनः॥ ३

athāta ānandadughaṃ padāmbujaṃ

haṃsāḥ śrayerannaravindalocana|

sukhaṃ nu viśveśvara yogakarmabhi-

stvanmāyayāmī vihatā na māninaḥ|| 3

अर्थ

पद्मलोचन! आप विश्‍वेश्‍वर हैं! आपके ही द्वारा सारे संसारका नियमन होता है। इसीसे सारासार-विचारमें चतुर मनुष्य आपके आनन्दवर्षी चरणकमलोंकी शरण लेते हैं और अनायास ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। आपकी माया उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती; क्योंकि उन्हें योगसाधन और कर्मानुष्ठानका अभिमान नहीं होता। परन्तु जो आपके चरणोंका आश्रय नहीं लेते, वे योगी और कर्मी अपने साधनके घमंडसे फूल जाते हैं; अवश्य ही आपकी मायाने उनकी मति हर ली है॥ ३॥

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