श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

प्रायशः पुण्डरीकाक्ष युंजन्तो योगिनो मनः।

विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहकर्शिताः ॥ २

prāyaśaḥ puṇḍarīkākṣa yuṃjanto yogino manaḥ|

viṣīdantyasamādhānānmanonigrahakarśitāḥ || 2

अर्थ

कमलनयन! आप जानते ही हैं कि अधिकांश योगी जब अपने मनको एकाग्र करने लगते हैं, तब वे बार-बार चेष्टा करनेपर भी सफल न होनेके कारण हार मान लेते हैं और उसे वशमें न कर पानेके कारण दुःखी हो जाते हैं॥ २॥

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