मैंने जिस सुस्पष्ट और युक्तियुक्त ज्ञानका वर्णन बार-बार किया है, उसके मर्मको जो समझ लेता है, उसके हृदयकी संशय-ग्रन्थियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं और वह मुक्त हो जाता है॥ २४॥
अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत्।
एतद् विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः॥ २४
मैंने जिस सुस्पष्ट और युक्तियुक्त ज्ञानका वर्णन बार-बार किया है, उसके मर्मको जो समझ लेता है, उसके हृदयकी संशय-ग्रन्थियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं और वह मुक्त हो जाता है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 893) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/29/24/