श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यो यो मयि परे धर्मः कल्प्यते निष्फलाय चेत्।

तदायासो निरर्थः स्याद् भयादेरिव सत्तम॥ २१

yo yo mayi pare dharmaḥ kalpyate niṣphalāya cet|

tadāyāso nirarthaḥ syād bhayāderiva sattama|| 21

अर्थ

भागवतधर्ममें किसी प्रकारकी त्रुटि पड़नी तो दूर रही—यदि इस धर्मका साधक भय-शोक आदिके अवसरपर होनेवाली भावना और रोने-पीटने, भागने-जैसा निरर्थक कर्म भी निष्कामभावसे मुझे समर्पित कर दे तो वे भी मेरी प्रसन्‍नताके कारण धर्म बन जाते हैं॥ २१॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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