श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

योगचर्यामिमां योगी विचरन् मदपाश्रयः।

नान्तरायैर्विहन्येत निःस्पृहः स्वसुखानुभूः॥ ४४

yogacaryāmimāṃ yogī vicaran madapāśrayaḥ|

nāntarāyairvihanyeta niḥspṛhaḥ svasukhānubhūḥ|| 44

अर्थ

जो साधक मेरा आश्रय लेकर मेरे द्वारा कही हुई योगसाधनामें संल‌ग्‍न रहता है, उसे कोई भी विघ्न-बाधा डिगा नहीं सकती। उसकी सारी कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं और वह आत्मानन्दकी अनुभूतिमें म‌ग्‍न हो जाता है॥ ४४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धेऽष्टाविंशोऽध्यायः

॥ २८॥

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