श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

योगं निषेवतो नित्यं कायश्‍चेत् कल्पतामियात्।

तच्छ्रद्दध्यान्‍न मतिमान् योगमुत्सृज्य मत्परः॥ ४३

yogaṃ niṣevato nityaṃ kāyaścet kalpatāmiyāt|

tacchraddadhyānna matimān yogamutsṛjya matparaḥ|| 43

अर्थ

यदि कदाचित् बहुत दिनोंतक निरन्तर और आदरपूर्वक योगसाधना करते रहनेपर शरीर सुदृढ़ भी हो जाय, तब भी बुद्धिमान् पुरुषको अपनी साधना छोड़कर उतनेमें ही सन्तोष नहीं कर लेना चाहिये। उसे तो सर्वदा मेरी प्राप्तिके लिये ही संल‌ग्‍न रहना चाहिये॥ ४३॥

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