श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कांश्‍चिन्ममानुध्यानेन नामसंकीर्तनादिभिः।

योगेश्‍वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदाञ्छनैः॥ ४०

kāṃścinmamānudhyānena nāmasaṃkīrtanādibhiḥ|

yogeśvarānuvṛttyā vā hanyādaśubhadāñchanaiḥ|| 40

अर्थ

काम-क्रोध आदि विघ्नोंको मेरे चिन्तन और नाम-संकीर्तन आदिके द्वारा नष्ट करना चाहिये। तथा पतनकी ओर ले जानेवाले दम्भ-मद आदि विघ्नोंको धीरे-धीरे महापुरुषोंकी सेवाके द्वारा दूर कर देना चाहिये॥ ४०॥

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