श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.39

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

योगधारणया कांश्‍चिदासनैर्धारणान्वितैः।

तपोमन्त्रौषधैः कांश्‍चिदुपसर्गान् विनिर्दहेत्॥ ३९

yogadhāraṇayā kāṃścidāsanairdhāraṇānvitaiḥ|

tapomantrauṣadhaiḥ kāṃścidupasargān vinirdahet|| 39

अर्थ

गरमी-ठंडक आदिको चन्द्रमा-सूर्य आदिकी धारणाके द्वारा, वात आदि रोगोंको वायुधारणायुक्त आसनोंके द्वारा और ग्रह-सर्पादिकृत विघ्नोंको तपस्या, मन्त्र एवं ओषधिके द्वारा नष्ट कर डालना चाहिये॥ ३९॥

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