श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र-

मज्ञानमात्मन्यविविक्तमंग ।

निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव

न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा॥ ३३

pūrvaṃ gṛhītaṃ guṇakarmacitra-

majñānamātmanyaviviktamaṃga |

nivartate tat punarīkṣayaiva

na gṛhyate nāpi visṛjya ātmā|| 33

अर्थ

उद्धवजी! (इसका यह अर्थ नहीं है कि अज्ञानीने आत्माका त्याग कर दिया है और ज्ञानी उसको ग्रहण करता है। इसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि) अनेकों प्रकारके गुण और कर्मोंसे युक्त देह, इन्द्रिय आदि पदार्थ पहले अज्ञानके कारण आत्मासे अभिन्‍न मान लिये गये थे, उनका विवेक नहीं था। अब आत्मदृष्टि होनेपर अज्ञान और उसके कार्योंकी निवृत्ति हो जाती है। इसलिये अज्ञानकी निवृत्ति ही अभीष्ट है। वृत्तियोंके द्वारा न तो आत्माका ग्रहण हो सकता है और न त्याग॥ ३३॥✎ 1452

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1452 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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