श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्।

स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ १४

yathā hyapratibuddhasya prasvāpo bahvanarthabhṛt|

sa eva pratibuddhasya na vai mohāya kalpate|| 14

अर्थ

जब मनुष्य स्वप्न देखता रहता है, तब नींद टूटनेके पहले उसे बड़ी-बड़ी विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है; परन्तु जब उसकी नींद टूट जाती है, वह जग पड़ता है, तब न तो स्वप्नकी विपत्तियाँ रहती हैं और न उनके कारण होनेवाले मोह आदि विकार॥ १४॥

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