श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.53

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन१ विन्दति।

भक्तियोगं स लभते एवं यः पूजयेत माम्॥ ५३

māmeva nairapekṣyeṇa bhaktiyogena vindati|

bhaktiyogaṃ sa labhate evaṃ yaḥ pūjayeta mām|| 53

अर्थ

जो निष्कामभावसे मेरी पूजा करता है, उसे मेरा भक्तियोग प्राप्त हो जाता है और उस निरपेक्ष भक्तियोगके द्वारा वह स्वयं मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ५३॥✎ 1769

टिप्पणियाँ

  1. १

    क्रियायोगेन।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 882)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1769 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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