श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.52

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम्।

पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात्॥ ५२

pratiṣṭhayā sārvabhaumaṃ sadmanā bhuvanatrayam|

pūjādinā brahmalokaṃ tribhirmatsāmyatāmiyāt|| 52

अर्थ

मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठा करनेसे पृथ्वीका एकच्छत्र राज्य, मन्दिर-निर्माणसे त्रिलोकीका राज्य, पूजा आदिकी व्यवस्था करनेसे ब्रह्मलोक और तीनोंके द्वारा मेरी समानता प्राप्त होती है॥ ५२॥✎ 1769

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1769 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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