उद्धवजी! जो मनुष्य इस प्रकार वैदिक, तान्त्रिक क्रियायोगके द्वारा मेरी पूजा करता है वह इस लोक और परलोकमें मुझसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है॥ ४९॥✎ 1769
एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः।
अर्चन्नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम्॥ ४९
उद्धवजी! जो मनुष्य इस प्रकार वैदिक, तान्त्रिक क्रियायोगके द्वारा मेरी पूजा करता है वह इस लोक और परलोकमें मुझसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 881) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/27/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)