श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः।

अर्चन्‍नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम्॥ ४९

evaṃ kriyāyogapathaiḥ pumān vaidikatāntrikaiḥ|

arcannubhayataḥ siddhiṃ matto vindatyabhīpsitām|| 49

अर्थ

उद्धवजी! जो मनुष्य इस प्रकार वैदिक, तान्त्रिक क्रियायोगके द्वारा मेरी पूजा करता है वह इस लोक और परलोकमें मुझसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है॥ ४९॥✎ 1769

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1769 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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