श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सन्‍निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।

व्यवहारः सन्‍निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः॥ ६

sannipātastvahamiti mametyuddhava yā matiḥ|

vyavahāraḥ sannipāto manomātrendriyāsubhiḥ|| 6

अर्थ

उद्धवजी! ‘मैं हूँ और यह मेरा है’ इस प्रकारकी बुद्धिमें तीनों गुणोंका मिश्रण है। जिन मन, शब्दादि विषय, इन्द्रिय और प्राणोंके कारण पूर्वोक्त वृत्तियोंका उदय होता है, वे सब-के-सब सात्त्विक, राजस और तामस हैं॥ ६॥

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