श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मदर्पणं निष्फलं वा सात्त्विकं निजकर्म तत्।

राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायादि तामसम्॥ २३

madarpaṇaṃ niṣphalaṃ vā sāttvikaṃ nijakarma tat|

rājasaṃ phalasaṃkalpaṃ hiṃsāprāyādi tāmasam|| 23

अर्थ

जब अपने धर्मका आचरण मुझे समर्पित करके अथवा निष्कामभावसे किया जाता है तब वह सात्त्विक होता है। जिस कर्मके अनुष्ठानमें किसी फलकी कामना रहती है, वह राजसिक होता है और जिस कर्ममें किसीको सताने अथवा दिखाने आदिका भाव रहता है, वह तामसिक होता है॥ २३॥

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