श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सत्त्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।

तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः॥ २२

sattve pralīnāḥ svaryānti naralokaṃ rajolayāḥ|

tamolayāstu nirayaṃ yānti māmeva nirguṇāḥ|| 22

अर्थ

जिसकी मृत्यु सत्त्वगुणोंकी वृद्धिके समय होती है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है; जिसकी रजोगुणकी वृद्धिके समय होती है, उसे मनुष्य-लोक मिलता है और जो तमोगुणकी वृद्धिके समय मरता है, उसे नरककी प्राप्ति होती है। परन्तु जो पुरुष त्रिगुणातीत—जीवन्मुक्त हो गये हैं, उन्हें मेरी ही प्राप्ति होती है॥ २२॥

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