॥ श्रीहरिः ॥
यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।
तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥ १०
yadā bhajati māṃ bhaktyā nirapekṣaḥ svakarmabhiḥ|
taṃ sattvaprakṛtiṃ vidyāt puruṣaṃ striyameva vā|| 10
अर्थ
पुरुष हो, चाहे स्त्री—जब वह निष्काम होकर अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंद्वारा मेरी आराधना करे, तब उसे सत्त्वगुणी जानना चाहिये॥ १०॥
यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।
तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥ १०
पुरुष हो, चाहे स्त्री—जब वह निष्काम होकर अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंद्वारा मेरी आराधना करे, तब उसे सत्त्वगुणी जानना चाहिये॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.25.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 867) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/10/