श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.53

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः

किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।

न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात्

क्रुध्येत कस्मान्‍न सुखं न दुःखम्॥ ५३

ātmā yadi syāt sukhaduḥkhahetuḥ

kimanyatastatra nijasvabhāvaḥ|

na hyātmano'nyad yadi tanmṛṣā syāt

krudhyeta kasmānna sukhaṃ na duḥkham|| 53

अर्थ

यदि ऐसा मानें कि आत्मा ही सुख-दुःखका कारण है तो वह तो अपना आप ही है, कोई दूसरा नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्‍न कुछ और है ही नहीं। यदि दूसरा कुछ प्रतीत होता है तो वह मिथ्या है। इसलिये न सुख है, न दुःख; फिर क्रोध कैसा? क्रोधका निमित्त ही क्या?॥ ५३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें