श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.52

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु

किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।

यदंगमंगेन निहन्यते क्‍वचित्

क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे॥ ५२

duḥkhasya heturyadi devatāstu

kimātmanastatra vikārayostat|

yadaṃgamaṃgena nihanyate kvacit

krudhyeta kasmai puruṣaḥ svadehe|| 52

अर्थ

यदि ऐसा मान लें कि देवता ही दुःखके कारण हैं तो भी इस दुःखसे आत्माकी क्या हानि? क्योंकि यदि दुःखके कारण देवता हैं, तो इन्द्रियाभिमानी देवताओंके रूपमें उनके भोक्ता भी तो वे ही हैं। और देवता सभी शरीरोंमें एक हैं; जो देवता एक शरीरमें हैं; वे ही दूसरेमें भी हैं। ऐसी दशामें यदि अपने ही शरीरके किसी एक अंगसे दूसरे अंगको चोट लग जाय तो भला, किसपर क्रोध किया जायगा?॥ ५२॥

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