श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः।

येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्‍चात्मनः प्लवः॥ २८

nūnaṃ me bhagavāṃstuṣṭaḥ sarvadevamayo hariḥ|

yena nīto daśāmetāṃ nirvedaścātmanaḥ plavaḥ|| 28

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि सर्वदेवस्वरूप भगवान् मुझपर प्रसन्‍न हैं। तभी तो उन्होंने मुझे इस दशामें पहुँचाया है और मुझे जगत‍्के प्रति यह दुःख-बुद्धि और वैराग्य दिया है। वस्तुतः वैराग्य ही इस संसार-सागरसे पार होनेके लिये नौकाके समान है॥ २८॥ मैं अब ऐसी अवस्थामें पहुँच गया हूँ। यदि मेरी आयु शेष हो तो मैं आत्मलाभमें ही सन्तुष्ट रहकर अपने परमार्थके सम्बन्धमें सावधान हो जाऊँगा और अब जो समय बच रहा है, उसमें अपने शरीरको तपस्याके द्वारा सुखा डालूँगा॥ २९॥ तीनों लोकोंके स्वामी देवगण मेरे इस संकल्पका अनुमोदन करें। अभी निराश होनेकी कोई बात नहीं है, क्योंकि राजा खट्वांगने तो दो घड़ीमें ही भगवद्धामकी प्राप्ति कर ली थी॥ ३०॥

यह व्याख्या श्लोक 11.23.28 से 11.23.30 तककी एक साथ है।

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