श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

कस्मात् संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।

कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः॥ २६

kasmāt saṃkliśyate vidvān vyarthayārthehayāsakṛt|

kasyacinmāyayā nūnaṃ loko'yaṃ suvimohitaḥ|| 26

अर्थ

मुझे मालूम नहीं होता कि बड़े-बड़े विद्वान् भी धनकी व्यर्थ तृष्णासे निरन्तर क्यों दुःखी रहते हैं? हो-न-हो, अवश्य ही यह संसार किसीकी मायासे अत्यन्त मोहित हो रहा है॥ २६॥

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