श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः।

खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत्॥ १३

tasyaivaṃ dhyāyato dīrghaṃ naṣṭarāyastapasvinaḥ|

khidyato bāṣpakaṇṭhasya nirvedaḥ sumahānabhūt|| 13

अर्थ

धनके नाशसे उसके हृदयमें बड़ी जलन हुई। उसका मन खेदसे भर गया। आँसुओंके कारण गला रुँध गया। परन्तु इस तरह चिन्ता करते-करते ही उसके मनमें संसारके प्रति महान् दुःखबुद्धि और उत्कट वैराग्यका उदय हो गया॥ १३॥

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