श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जितः।

उपेक्षितश्‍च स्वजनैश्‍चिन्तामाप दुरत्ययाम्॥ १२

sa evaṃ draviṇe naṣṭe dharmakāmavivarjitaḥ|

upekṣitaśca svajanaiścintāmāpa duratyayām|| 12

अर्थ

उद्धवजी! इस प्रकार उसकी सारी सम्पत्ति जाती रही। न तो उसने धर्म ही कमाया और न भोग ही भोगे। इधर उसके सगे-सम्बन्धियोंने भी उसकी ओरसे मुँह मोड़ लिया। अब उसे बड़ी भयानक चिन्ताने घेर लिया॥ १२॥

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